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हम आनंद की बात तो हमेशा करते हैं।भोजन करने के उपरांत हम कहते हैं की भोजन करके आनंद आ गया। तो क्या भोजन में आनंद है? इसी तरह और वस्तुगत चीजों का भोग करके हम आनंद प्राप्ति की बात कहते हैं। यदि आनंद को परिभाषित करना हो तो हम कैसे करेंगे? क्या हम हर एक वस्तु के लिए आनंद को परिभाषित करेंगे? या फिर हम स्वयं पर केंद्रित हो कर आनंद की व्यख्या करने का प्रयास करेंगे? इस विषय में मेरा मत तो यह है की वस्तु से हठकर हम व्यक्तिगत होकर आनंद को परिभाषित करें। क्योंकी वस्तुए तो बहुत हैं पर उनका आनंद लेने वाल मैं तो एक ही है। इसलिए वस्तुगत न होकर व्यक्तिगत मार्ग तर्क संगत लगता है। इस विषय में अध्यात्म का भी यही मत है, आत्मपरक शोध से हम आनंद के विषय में ज्ञान पा सकते हैं।

प्यासा होने पर पानी मिल जाए तो पानी पीने में आनंद मिल जाता है। उसी तरह भूख़ लगने पर भोजन करके आनंद मिलता है। और उदाहरण न देकर हम ये कह सकते हैं की इंद्रियो की तृप्ति में आनंद होता है। मनुष्य य जीव का आनंद मुख्य तौर पर 4 बातों पर निर्भर करता है। 1. भोजन (पानी भी आता है), 2. संभोग (सेक्स), 3. नींद (स्लीप), 4. आत्म रक्षा (self preservation) इसमें कपडे, घर इत्यादि आते हैं। हमारी सभी इक्छाओ के पीछे यहीं 4 कारण संयुक्त रूप से काम करते हैं। उदाहरण के तौर पर, सर्दी लगने पर गरम कपड़े पहने से इंद्रिया शान्त हो जाती हैं जिसे हम आनंद के रूप में महसूस करते हैं। कहने का अर्थ यह है की इन्द्रीयों से प्रेरित होकर ही इक्छाओ का जन्म होता है, जब तक इंद्रिया शान्त नहीं हो जाती तब तक हमें आनंद की अनुभूति वें नहीं करने देती। जैसे ही इक्छा की पूर्ती होती है, इंद्रिया शान्त हो जातीं हैं और आनंद वापिस आ जाता है। अब आप यह बात समझ लीजये की आनंद का इक्छाओ से और उनकी पूर्ति से कोई लेना देना नहीं है, आनंद तो स्वतः हासिल है, परंतु इंद्रियो से प्रेरित इक्छाए मन में उथल पुथल मचाएं रहती हैं जिसे हम आनंद से वंचित रह जाते है, उथल पुथल शान्त होते ही आनंद स्वतः हासिल हो जाता है।

आनंद तो शांति में है, जब मन की इक्छा पूरी हो जाती है तो मन कुछ देर के लीये शान्त हो जाता है और हम आनंद का अनुभव करते हैं। कुछ ही पल बाद कोई दूसरी इक्छा के आ जानें से मन फ़िर से अशांत हो जाता है और आनंद पर से ध्यान हट कर इक्छा पूर्ती में लग जाता है। यदि मन इक्छा रहित हो जाए तो शान्ति में आनंद स्वतः प्राप्त है। हमें कुछ और उपाए करने की ज़रूरत नहीं है। तो अब यह बात सिद्ध हो गयी की आनंद वस्तुओं में नहीं है, इन्द्रियों में नहीं है, मन में नहीं, इक्छाओ और उनकी पूर्ती में भी नहीं है बल्कि आनंद तो हमारे मूल स्वभाव में है। आनंद को प्राप्त करने के लिए हमे कोई प्रयास नहीं करना है, आनंद तो सहज ही प्राप्त है। संत कबीर के दोहें से इस लेख़ का समापन करूँगा।

अजित वर्मा।

कस्तुरी कुंडल बसे, मृग ढूंढे बन, माहीज्यों घट घट राम है, दुनियां देखे नाही।।
Kasturi Kundal Base Mrug Dhoondhe Ban Maahi Jyo Ghat Ghat Ram Hai Duniya Dekhe Nahi A deer has the fragrance in itself and runs throughout the forest for finding it. Similarly Ram (आनंद) is everywhere but the world does not see.

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