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उपाधियों से सुसज्जित और अलंकारों में अपनी पहचान खोजता आज का मनुष्य अपने आप से बहुत दूर जा चुका है। हम अपने आप को केवल उपाधियों में ढूंढ़ते हैं, मैं कौन हूँ? का जवाब हम डॉक्टर, इंजीनियर जैसी उपाधियों से देता हैं। इस लेख़ में हम उपाधियों और उसमे खोये मनुष्य की असली पहचान को ढूढ़ने का प्रयास करेंगे। आप सभी से विनम्र निवेदन है की मेरी इस ख़ोज में आप साथ साथ रहें।

उपाधियाँ मिलने का सिलसिला तो जीवन प्रारम्भ होते ही शुरू हो जाता है। सबसे पहले हमें अपने नाम की उपाधि मिल जाती है और फिर तो जैसे ये सिलसिला जीवन भर चलता रहता है। ईश्वर ने तो हमें केवल बनाया है, पर हम अपने आप को लिंग, जाती, रंग, देश, भाषा इत्यादि में बांटते चले जाते हैं। उपाधियों से बंध कर हम अपने जीवन के प्रति एक सीमित सोंच रखतें हैं जिससे बहार निकल पाना अक़्सर बहुत मुश्किल हो जाता है। लम्बे समय या पीढ़ियों से इन उपाधियों में बंधे रहने की वज़ह से हम इस जेल को अपना व्यक्तित्व मान कर इसे निभाते चले जाते हैं, चाहें हमें कितना भी कष्ट क्यों न हो पर हम तो इन बेड़ियों से बंधे हैं ना?

उदाहरण के तौर पर यह प्रश्न अपने आप से पूछें, मैं कौन हूँ? उत्तर में आप अपना नाम बताते हुए अपने माता पिता का नाम या अपने काम के बारे में बताने लगेंगे। जैसे मैं रमेश वर्मा हूँ, xyz कम्पनी में मैनेजर हूँ। उपाधियों को बताए बगैर हमारा काम नहीं चलता। उपाधियां केवल नाम और काम तक सिमित नहीं होती अक़्सर हम अपने आप को सुन्दर, कमज़ोर, साधारण इत्यादि जैसे अनेक अलंकारों से सुसज्जित करते है और इनको दिल से मानने भी लगते है। इन उपाधियों का बहुत गहरा असर होता है, अगर हम अपने आप को कमज़ोर समझते है तो हम वास्तव में कमज़ोर हो जाते हैं। इस तरह खुद को या दूसरों के द्वारा दी गई उपाधियां हमारे व्यक्तित्व को गढ़ने में अहम् भूमिका रखती हैं।

आत्मा का स्वभाव मुक्ति है, आनंद है, वो तो निराकार है, सभी उपाधियों से परे, वो तो बस है। उसके लिए ना तो कोई आरंभ है और न कोई अंत, शब्दों में उसे परिभाषित नहीं किया जा सकता, क्योंकी वो तो हमारे मूल में है। गहरी नींद में सभी उपाधियों से रिक्त, शान्ति शान्ति और शान्ति रूपी मौन जिसमें “मैं” नहीं है केवल हूँ है। मैं अजित हूँ और मैं अजित नहीं हूँ में क्या कोई अंतर है? मैं रहूँ या ना रहूँ परंतु “हूँ” हमेशा रहता है। नींद में केवल निरंतर रहने वाला निराकार “हूँ” रह जाता है। मैं, जो आता जाता रहता है वो इस हूँ पर निर्भर रहता है। मैं ही सभी उपाधियों का स्रोत है, पर बिना हूँ के वो कुछ नहीं। यहाँ पर यह बता दूँ की मैं आप को हिंदी भाषा का ज्ञान नहीं दे रहा हूँ, बल्कि आपकों “मैं” और “हूँ” के पीछे छुपा राज़ बता रहा हूँ।

कबीर दास जी ठीक ही तो कहते हैं, ” जब मैं था तब हरि नही, अब हरि हैं मैं नाहि | ऐसे घट घट राम हैं दुनिया जानत नाहि।

हमारे जीवन के सारे सुख और दुःख इन उपाधियों के कारण होते हैं, “मैं” जब माता की उपाधि ले लेता है तब उसे अपने बच्चे से बिछड़ने का दुःख होता हैं। जीवन में जितनी ज़्यादा उपाधियां उतना ही जटिल व्यक्तिव हो जाता है। इन उपाधियों से मुक्ति का मार्ग तो केवल गुरु की क्रिपा से मिल सकता है परंतु यह बात अवश्य जान ले की मनुष्य के अंदर इस ज्ञान की प्यास का होना अति आवश्यक है, गुरु किसी ना किसी रूप में आपके के पास आ जाऐगा। जय गुरु कहकर इस लेख़ का समापन करूँगा।

अजित वर्मा।

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