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उड़के उज्जवल भविष्य की ओर, चले गए वो, घर को छोड़

पलायन कारी मानसिकता से ग्रस्त आज की पीढ़ी पर शायद ये कविता ढीक बैठती हैं। मन के फ़ुसलावे में आकर युवा क़दम अक़्सर बहक जाते हैं। कुछ करने के फ़ेर में गलती पर गलती होती चली जाती है, शायद क़ामयाबी की परिभाषा गलती को दोहराना हैं। हाल ही में हुई प्रत्युषा बनर्जी की दुःखद मृत्यु, युवाओं में वयाप्त असंतोष और मानसिक पीड़ा को दर्शाती ये कुछ पंक्तिया प्रस्तुत करता हूँ।

उड़के उज्जवल भविष्य की ओर, चले गए वो, घर को छोड़, दोस्तों से अलविदा बोलकर, वो चल दिये मक़सद की ओर, यादें तो थी मन में बहुत मगर, यादों से नहीं लगते सपनो को पर। करना हैं उनको काम बड़ा उससे होगा नाम बड़ा, शौहरत की महँगी मंडी में, बोल लगते हैं बड़े। उड़के उज्जवल भविष्य की ओर, चले गए वो, घर को छोड़।

मन तो उड़ता पंछी हैं उसका ना कोई संघी हैं, ये बात समझना क्या मुश्किल हैं? की हरदम उसको जल्दी हैं। सपनों के पीछे भागे वो, की सपनों को सच करना था जो। पर सपने तो सपनें होते हैं, जागो तो वो उड़ जाते हैं। अब समझ में आता है की घर छोड़ के क्यों वो जाते हैं। उड़के उज्जवल भविष्य की ओर, चले गए वो, घर को छोड़।

छोड़ कर घोसला एक दिन चिडया तो उड़ जाती हैं, माँ की गोद हमेशा खाली ही रह जाती हैं। जो आया सो जाएगा एक दिन ये कहकर वो समझाते है, अपने सुंदर ख्वाबों में वो अक्सर अंधे हो जाते हैं। उड़के उज्जवल भविष्य की ओर, चले गए वो, घर को छोड़।

उड़ गए समय की अंधी में सपनें जो उनके अपने थे, हाथो में अब लाचारी हैं, सपनों पर क़िस्मत भारी है। बंद कर लो चाहें मुट्ठी कितनी, खली मग़र वो रह जानी है, जो जाना है सो जाएगा ये बात आपसे सीखी है। अब समझ में आता है, की घर छोड़ के क्यों वो जाते हैं। उड़के उज्जवल भविष्य की ओर, चले गए वो, घर को छोड़।

लेखकः अजित वर्मा।

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