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आज के दौर में ज़्यादातर लोंगो की यही शिकायत है की घर परिवार और सम्पति होते हुए भी कहीं न कहीं कुछ कमी महसूस होती है। किसी के पास नौकरी है तो परिवार में दिक्कत, जिसके पास परिवार हैं तो वो नौकरी से ना खुश, अर्थात जीवन में सबको, सब कुछ तो नहीं मिल सकता! यही कहकर हम अपने आपको समझाते हैं। पूर्णता का अभाव ही जीवन की सच्चाई बन गई हैं। बचपन से बुढ़ापे तक सारे हतकंडे अपना कर भी हम अधूरे ही रह जाते हैं, जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु से भागते भागते जीवन भर की पूँजी लूटा देतें हैं हम, पर अभाव साथ नहीं छोड़ता। जीवन की अंतिम सांस तक हम अधूरें ही क्यों रह जाते हैं?

अपने आप से इन मुश्किल सवालों को पूछने की बजाये हम जीवन भर समझौते करते रह जाते हैं। चलो ये नहीं मिला तो कुछ और ही सही, यह कहकर हम जीवन में समझौते करना सीखते हैं और समझौते की कला में माहिर होकर ख़ुद पर गर्व करने लगते हैं। जीवन को दुकान समझ कर चलना, केवल फायदा और नुक्सान के बारे में सोचना हमारी नियति बन गई हैं। जब जीवन समझौते करके फायदा नुक्सान का हिसाब लिखने वाली किताब बन जाएगी, तब नीरस ही हो जायेगा ना! हमने अपने जीवन को फायदा और नुक्सान के बीच चलने वाला खेल बना दिया है इसलिये तो हम नीरस हो गए हैं। अभाव का कारण, हमारी परवरिश में छुपा हुआ है, बचपन से ही हमें समझौते करना और जितना फायदा मिल सकता है उतना ले लेना सिखाया जाता है, यही गलत शिक्षा जीवन को नीरस बना देती है। इसका इलाज़ तो मर कर भी नहीं होता, जीवन चक्र में उलझी जीव आत्मा को कभी शान्ति नहीं मिलती।

कर्म कांड में रूचि लेने वाला मनुष्य केवल अपने निज़ी फायदे के लिये ये सब करता है, भगवान को केवल अपनी मनोकामना पूरी करने का साधन समझता है। भगवान इक्छा पूर्ति के साधन मात्र नहीं हैं, सच्ची क्रिपा इक्छा पूर्ति में नहीं हैं बल्की इक्छा से मुक्ति में है। गीता में कृष्ण ने भक्तों से अपना सब कुछ उनको समर्पित कर देने को कहा हैं। मुक्ति इक्छाओ के समर्पण में है, इसी से आपको भगवान का प्रिय प्रसाद शान्ति प्राप्त होगी।

लेखकः अजित वर्मा

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