टाइम एंड स्पेस इज़ इल्लुशन

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अक्सर हम ये सोचते हैं की समय अंतराल के संबंध में किये गये शोध भैतिक विज्ञान के दायरे में आते हैं, पर भौतिक विज्ञान का शोध वस्तुगत होता है जिसे हम अंग्रेजी में ऑब्जेक्टिव स्टडी कहते हैं। जब शोध सब्जेक्टिव हो जाता है तब अध्यात्म कहलता है। हमारा उद्देश्य भैतिक विज्ञान की निन्दा करना नहीं, बल्की यह कहना है की ज्ञान प्राप्त करने का दूसरा भी एक विकल्प मौजूद है जिसे हम सब्जेक्टिव स्टडी या आत्मपरक शोध कहते हैं। अध्यात्म को लोग अकसर विज्ञान के उलट समझ कर नकार देते हैं पर भारतवर्ष की जो ख्याति पूरे संसार में है वह इसी अध्यात्म की वज़ह से है। क्या आधुनिकता का मतलब सिर्फ विज्ञान है? बिना अध्यात्म के विज्ञान समाज का भला नहीं कर सकता है। वैदिक काल से ही विज्ञान और अध्यात्म भारत वर्ष की नींव में रहे हैं इसलिए भारतवर्ष सोने की चिड़िया कहलाता था। पर आज हम पूरी तरह विज्ञान पर निर्भर हैं, समाज का जो नैतिक पतन हुआ है वो अध्यात्म की कमी दर्शाता है। विज्ञान हमें साधन पूर्ती के नए नए अवसर तो प्रदान करता है परन्तु वह हमें अपनी सीमाओ में रह कर उपभोग करने के विष्य में कुछ भी नहीं बताता। हमारे समाज में व्याप्त अनेक समस्याऐ विज्ञान की इसी कमी को दर्शाती हैं। समाज का तराजू जो विज्ञान की ओर झुका हुआ है उसे अध्यात्म से संतुलित करने की आवश्यकता है। हम पहले विज्ञान की दृष्टी से समय अंतराल को समझेंगे फिर आत्मपरक (subjective) दृष्टि से अध्यन करेगें।

क्यों की समय व्यक्तिगत अनुभव होता है इसलिये आत्मपरक शोध (subjective study) में हम समय को अपने से अलग कोई वस्तु न देख कर उसे स्वयं का ही विस्तार मानकर शोध करते हैं। इसके पीछे तर्क ये है की समय एक अनुभव है और अनुभव करने वाले साक्षी को हटाकर केवल अनुभव पर शोध् कैसे हो सकता है? जब हम साक्षी को ध्यान में रखकर शोध् करते हैं तब इसे आत्मपरक शोध कहते हैं। बिना साक्षी के अनुभव कैसा?

मशहूर वैज्ञानिक एल्बर्ट इंस्टीन ने थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी में समय को सापेक्ष माना है, इंस्टीन के मुताबिक़ समय की गति एक जैसी नहीं रहती है वो बदलती रहती है। सुपर मैसिव ब्लैक होल जहाँ गुरुत्वाकर्षण बल बहुत अधिक होता है वहाँ समय अंतराल शून्य हो जाता है, इस स्थिति को सिंगुलैरिटी कहते है। कहने का अर्थ ये है की समय अंतराल के बिना भी कुछ है जो समय अंतराल को भी अपने अंदर समेटे हुए है। ब्रह्माण्ड की उथल पुथल से अनिभ्ग पर संपूर्ण ब्रह्माण्ड का आधार है, ये शून्य ही तो है जो स्थिर है। ये आश्चर्य की बात नहीं है क्या, की यह शून्य भारतवर्ष की देन है। हमारे वेदों में इस शून्य की व्याख्या हमेशा से थी।

हम सभी घटनाओं को समय और अंतराल में देखने के अभ्यस्त है, जैसे की बीते समय में हुई कोई घटना य आने वाले समय में हम कुछ करेंगे इसकी कामना। कहने का अर्थ यह है की विचार समय और अंतराल में ही आते हैं। बिना समय-अंतराल के तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते। तो आइए जाने समय-अंतराल को। इससे पहले हम आगें कुछ कहें यह बता देना जरुरी है की बिना सही पृष्ठभूमि के कुछ भी समझा पाना बहुत मुश्किल होता है। इसलिए पाठकों से यह निवेदन है की वे इस लेख को अन्त तक पढ़े।

स्वप्न में देखी गयी बातें किस अंतराल-समय में घटित होती हैं, वह कौनसी जगह है जहां स्वप्न आतें हैं? इसको समझने के लिए हमें विचारों को समझना होगा। मन और कुछ नहीं बल्कि विचारों का आवागमन है, लेकिन आवागमन होने के लिये कोई स्थायी परिदृश्य की भी तो आवश्यकता होगी। जैसे घड़ी की सुई चलती है मगर पीछे लेखे हुए अंक स्थिर रहते हैं तभी तो हम समय बता पते हैं। बिना स्थायी परिदृश्य के हम किसी का भी मूल्यांकन नहीं कर सकते हैं। जैसे 10 को आधार मान कर हम किसी को 4 नंबर दें सकते हैं लेकिन सिर्फ 4 कहने से हम मूल्यांकन नहीं कर सकते। इसलिये यह आवश्यक है की हम इस स्थाई परिदृश्य की ओर अपना ध्यान दें। आप को यह समझना चाहिए की बिना किसी स्थाई आधार के हम कुछ भी नहीं कर सकते, उदाहरण के तौर पर आप सिनेमा का पर्दा लिजिए, बिना सफ़ेद पर्दे के हम रंगो से भरी पिक्चर नहीं देख सकते हैं। स्थाईत्व ही वह कुंजी है जिस पर हमारा ध्यान कभी नहीं जाता। बिना किसी गुण के यह वो चीज है जो स्थाई है, ठीक सिनेमा के परदे की तरह सफ़ेद।

विचरों के आवागमन पर लौटते हुऐ अब हम ये जान चुके है की विचार के आने और जाने के लिये स्थाई तत्व का होना आवश्यक है, यह वो परदा है जिस पर विचार आते और जाते हैं  पर परदा हमेशा मौजूद रहता है। विचार शून्यता में भी ये स्थाईत्व रूपी परदा मौजूद रहता है। जैसे विद्युत और चुम्बकत्व का रिश्ता होता है वैसे ही विचरों का रिश्ता समय और अंतराल से होता है। समय अंतराल तो व्यक्तिगत अनुभव होता है, किसी को समय तेज़ चलता महसूस होता है तो किसी को धीमा। नींद में विचारों की गति ठहर जाती है तो समय और अंतराल भी ग़ायब हो जाते है, जागने पर समय अंतराल का अनुभव पुनः होने लगता है।
ध्यान की अवस्था में जब हम द्रष्टा की भाँति विचरों को आता जाता देखते हैं तब एक समय के बाद विचरों की गति धीमी होने लगती है और आते जाते विचरों के बीच में जो स्थाईत्व है (विचार हीनता) वो और गहरा हो जाता है। ध्यान लगाने में परिपक्वता हासिल होने पर स्थाईत्व पर पकड़ मज़बूत हो जाती है। विचरों के साथ समय और अंतराल भी उसी शून्य में विलीन हो जाता है। निरंतर अभ्यास से हम स्थाईत्व (present moment) को पहचाने लगते हैं और इसमें रहने लगते हैं।

समय और अंतराल काल्पनिक हैं ये साबित करना कोई मुश्किल नहीं है। काल्पनिकता का मतलब जो निरंतर ना हो। सत्य तो स्थाई होता है, वो तो निरंतर होता है पर काल्पनिकता में निरंतरता नहीं होती, स्थाईत्व भी नहीं होता। विज्ञानं भी समय और अंतराल को परिवर्तनशील मानता है। विज्ञानं समय को सापेक्ष (रिलेटिव) मानता है, इसका मतलब बिना किसी रेफरेंस पॉइंट के समय की गड़ना नहीं हो सकती। जब समय की निर्भरता किसी दूसरे पर निर्भर   करती है तो वो सत्य कैसे हो सकता हैं। समय अंतराल एक दूसरे में गुथे हुऐ हैं इसलिए दोनों ही सत्य नहीं हैं। अध्यात्म भी हमें यही बताता है की समय और अंतराल काल्पनिक है, सेल्फ इन्क्वारी या आत्मपरक शोध भी इसी बात की पुष्टि कर देता है। कोई भी सेल्फ इन्क्वारी से स्वयं जान सकता है की समय काल्पनिक है या नहीं।

हम हमेशा अभी में रहते हैं, हमेशा अभी रहता हैं न कोई आने वाला कल और न कोई बीता हुआ कल। एक सेकंड पहले भी अभी था और एक सेकंड बाद भी है। अंग्रेजी में इसे नाउ (Now) या (present moment) कहते हैं। इस स्थाई प्रेजेंट मोमेंट की ओर ध्यान कभी नहीं जाता है और हम केवल विचरों से पैदा हुई भावनाओं को अपनी सम्पति मन कर सुखी और दुःखी होते रहते है। सेल्फ इन्क्वारी से हम इस Now/अभी को पहचानना सीखते हैं और अभ्यास से हमेशा इस अभी में रहते हैं। समय और अंतराल विचरों की गति से पैदा होते हैं और इस स्थाई रूपी अभी में विचरों के साथ ये भी ग़ायब हो जाते हैं। अगर हम ग़ौर से देखे तो हम यही पाएगें की जो भी परिवर्तन हो रहा हैं वो केवल मन में हो रहा है, हमारी इंद्रिया भी तो मन का विस्तार हैं। इसलिए जो संसार मन और इंद्रिया की गति से सजीव लग रहा है वो तो सिर्फ मन तक ही सिमित है, मन की गति रुकते ही संसार भी ग़ायब हो जाता है, कुछ रह जाता है तो अभी।

इस निरंतर रहने वाले अभी के ऊपर एक कविता लिख कर लेख को यहीं समाप्त करूँगा। आगे अब आप स्वयं ही जाँच कर ले की सत्या क्या हैं। भारतीय अध्यात्म हमेशा से इस मौन रूपी अभी को प्राथिमिकता देता रहा है।

निरंतरता के मौन आकाश में विचार चले आतें हैं।
निरंतरता के मौन आकाश में मैं कौन हूँ जो विचारों में मैं लगाता चला जाता हूँ, सुख और दुःख में मैं हूँ को खोता चला जाता हूँ, अनुभवों के दंगल में भावनाओं की भेंट क्यों चढ़ा देता हूँ, इस मैं में हूँ को क्यों भुला जाता हूँ। निरंतरता का आकाश छोड़ कर विचरों में क्यों चला जाता हूँ। मैं कौन हूँ इस प्रश्न में क्यों उलझ जाता हूँ, सब कुछ पाकर भी अधूरा क्यों रह जाता हूँ, निरंतरता के मौन आकाश में मैं कौन हूँ, जो विचारों में मैं लगाता चला जाता हूँ।

लेखकः अजित वर्मा

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