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क्या आपके जीवन में महत्वाकांक्षाओं और यथार्थ के बीच में संघर्ष तो नहीं है? आप जो पाना चाहते थे और आपके पास जो यथार्थ में है उससे आप संतुष्ट है या नहीं? जीवन में अक्सर लोगों को ऐसा लगता है की वे जो करना या बनना चाहते थे वो नहीं कर सकें, इसी को लेकर के उनकी महत्वाकांक्षाओं और यथार्थ के बीच में संघर्ष की स्थिती बन जाती है और जीवन स्वयं से संघर्ष बन जाता है। ऐसी स्थिती में हमें क्या करना चाहिए? महत्वाकांक्षाओं से समझौता या फ़िर जीवन में संघर्ष? यक़ीन मानिये ये दोनों ही विकल्प आपको सुख और शांति से जीने तो नहीं देंगे। अक़्सर हम अपने आपको इस दोराहे पर पातें है, दिल और दिमाग़ के बीच संघर्ष होता है, फ़िर चाहें दिल की सुनें या दिमाग़ की आपकी शांति का भंग होना तय है। आप की हार तो दोनों ही स्थिती में है, क्योंकी एक विकल्प को चुन कर दूसरे को छोड़ने का पछतावा आपको सदैव रहेंगा। ऐसे में हम करें तो करें क्या?

जीवन के प्रति अपने नज़रिये को बदलने की ज़रुरत है, अब तक आप विकल्पों के जँगल में शान्ति खोते आये हैं, जीवन में आपको शान्ति को हर परस्थिति में प्राथिमकता देनी होगी इस बात पर आप को विचार करना होगा की जीवन में शांति से बड़कर और कुछ नही होता। बिना शांति के धन दौलत सब कुछ व्यर्थ है। आप को सृष्टि के नियमो को समझना होगा, यदि आप रोटी चहिते हैं तो आप को अट्टा गूथना होगा, अट्टा जब रोटी बन जायेगा तब वापिस अट्टा नहीं बन सकता। सृष्टि परिवर्तन के नियम से चलती है यहां एक चीज़ दूसरी में परिवर्तित होती है, तो याद रखें की आप की इक्छाए आपको परिवर्तित कर के ही पूर्ण होंगी। रोटी बनने की इक्छा रखें अट्टा जब रोटी बन जाता है तब वो दोबारा अट्टा नहीं बन सकता। इक्छा पूर्ति में आप स्वयं को गूथ कर परिवर्तित कर लेते हैं। इसलिये कोई भी विकल्प चुनें परिवर्तन तो निश्चित है। परिवर्तन आपमें और आपसे कुछ लेकर ही होगा। परिवर्तन हमेशा शांति को भंग करके ही होता है। लोहार लोहे को पीट पीट कर आकर में ढालता है, इस प्रक्रिया में लोहे पर क्या बीतती है ये आपसे छुपा नहीं है। तो कोई भी विकल्प चुनें, दिल या दिमाग़, शान्ति तो भंग होगी।

आप को विचार करना होगा, शान्ति को हमेशा ऊपर रखना होगा। जब आप शांति को प्राथिमकता देगें तब विकल्पों के जंगल में रहकर भी आप शान्ति को प्राप्त होंगे। प्रकृति के नियमों को समझकर आप धीरे धीरे शान्ति को महत्त्व देना शुरू कर देंगे। स्वयं से जो संघर्ष चल रहा है उसे पूर्ण विराम देने के लिए आपको अपनी बुद्धि से काम लेना होगा। प्रकृति के इस महत्वपूर्ण नियम को समझना होगा। ब्रम्हांड की कुल ऊर्जा शून्य है और वो हमेशा शून्य ही रहती है। यह कैसे होता है? पदार्थ में जो ऊर्जा होती है उसे पॉजिटिव एनर्जी कहते है, पदार्थ के द्वारा जो गुरुत्वाकर्षण बल पैदा होता है जिसे नेगेटिव एनर्जी कहते है, पॉजिटिव और नेगेटिव का योग जीरो हो जाता है। इसी तरह जब कोई कार्य होता है तब उस कार्य में लगी ऊर्जा के बराबर और विपरीत निगेटिव एनर्जी भी पैदा हो जाती है जिसे कुल योग शून्य रह जाता है। इस तरह प्रकृति अपने अंदर संतुलन बना कर रखती है। इसलिये ये जान लीजिये की आप जो भी करते है प्रकृति उसे उतने ही विपरीत बल से संतुलित कर लेती है, इस तरह ऊर्जा का परिवर्तन मात्र होता है और कुछ नहीं। ब्रम्हांड के स्तर पर वास्तव में कोई कार्य नहीं होता।

काम चाहें इक्छाओ की पूर्ति के लिए या विकल्पों के चुनाव के लिए वज़ह कोई भी हो वास्तव में आप कुछ नहीं करते क्योंकी आप कुछ कर ही नहीं सकते, प्रकृति आपके हर काम के बदले में उतना ही विपरीत काम करके उसे संतुलित कर लेगी फिर जीवन में इतना संघर्ष क्यों करते है आप? जीवन को लेकर इतना परेशान क्यों हैं आप? जीवन में विकल्पों और इक्छाओ से जो संघर्ष पैदा होता प्रतीत हो रहा है वो तो केवल एक भ्रम या माया है और वास्तव में तो कुछ हो ही नहीं सकता। इसलिये स्वयं से संघर्ष तो व्यर्थ ही है।

अजित वर्मा।

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