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25 april 2016 Written by Ajit Verma

विविधताओं से भरा ये संसार जिसमें हम और आप रहते हैं क्या वास्तव में इतना विविध है या फ़िर जो भिन्नता संसार में हम देखते हैं वो नज़रों का धोका है? आज हम इसी प्रश्न पर विचार करते हुए सत्य को जानने की कोशिश करेंगे। अपने लेखों में मैंने कई बार बताया है की हम आत्मपरक शोध् के ज़रीए अपने प्रश्नों के उत्तर जानने का प्रयास करते हैं। लेख़ का प्रारम्भ हम एक अहम् प्रशन से करते हैं, क्या ब्रम्हांड का वज़ूद हमसें है या फ़िर हम ब्रम्हांड पर निर्भर करते हैं? आप शयद दूसरे विकल्प को सच मानेंगे, की हम ब्रम्हांड पर निर्भर करते है। मुझे आपके उत्तर से कोई हैरानी नहीं हुई, यह बात अपनी जगह सत्य ही लगती है की हम ब्रम्हांड के अन्दर रहते है और वही हमारा पालन पोषण करता है। इसलिए ब्रम्हांड पर हम निर्भर करते हैं। चलिए ठीक है, अब आप मुझे बताइये क्या कोई भी व्यक्ति नींद में ब्रम्हांड के होने की पुष्टी कर सकता है? यदि नहीं तो ब्रम्हांड को हमारे जागने का इंतज़ार करना होगा, ऐसे में तो ब्रम्हांड का वज़ूद हम पर निर्भर करता दिखता है। और अधिक न उलझते हुऐ आप स्वयं से ये प्रश्न करें की “ब्रम्हांड किसको दिखता है?” आप कहेंगे की ब्रम्हांड तो मुझको दिखता है, तो अपने आप से पूछिये की “मैं” कौन हूँ? ये “मैं” कहां से आता है और नींद में कहां चला जाता है?

ब्रम्हांड की उपस्थति तो मैं के साथ ही होती है, ज़रा विचार करें की अगर मैं ही नहीं होगा तो ब्रम्हांड की उपस्थति का साक्षी कौन बनेगा? फ़िर ये कौन कहेगा की ब्रम्हांड है या नहीं। नींद में जब मैं नहीं होता है तब ब्रम्हांड भी तो नहीं होता, तो अब प्रश्न उठता है की नींद में जब मैं नहीं होता तब क्या होता है? इस प्रश्न का उत्तर तो मैं के पास हो ही नहीं सकता क्योंकि नींद में मैं होता ही नहीं। इस प्रश्न का उत्तर तो आप स्वयं ही हैं। अब यह बात तो साफ़ हो गई की मैं और ब्रम्हांड एक साथ ही वज़ूद में आतें हैं और एक साथ ही नींद में गायब हो जाते हैं। अग़र मैं दृष्टा है तो ब्रम्हांड दृश्य होगा, तो दृश्य और द्रष्टा में क्या कोई अंतर है? अक़्सर स्वप्न में आप और आप के अतरिक्त बहुत से लोग होते है, स्वप्न में पेड़ पौधे, धरती आकाश, भोजन पानी जैसी चीज़े भी होती हैं। पर स्वप्न टूटने पर सब गायब हो जाता है। स्वप्न के दौरान हमें पता नहीं होता की हम स्वप्न देख रहें है, स्वप्न में देखी गई वस्तुए और उनको देखने वाला मैं किस चीज़ से बने हैं?

स्वप्न में स्वयं के अतरिक्त तो और कुछ होता ही नहीं है, धरती आकाश, फूल पत्ते इत्यादि सब कुछ स्वयं से ही तो बना होता है। दृश्य और दृष्टा दोनों ही स्वयं का विस्तार होते हैं और स्वयं से ही निर्मित होते हैं। यह स्वयं मैं नहीं होता, यह तो सिर्फ होता है और कुछ नहीं। नींद में मैं नहीं होता, सर्फ़ होता है या हूँ। जिस प्रकार स्वप्न स्वयं का विस्तार होता है उसी प्रकार जाग्रत अवस्था में दृश्य और दृष्टा दोंनो ही स्वयं का विस्तार होते है और नींद में दोनों ही एक साथ गायब हो जाते है, जो कुछ बचता है वो स्वयं है।

जब नींद में “मैं” का ज्ञान आ जाता है तो स्वप्न शुरू हो जाता है। स्वप्न भी तो जाग्रत अवस्था की तरह होता है, केवल हमें स्वप्न का ज्ञान नहीं होता उसी प्रकार जाग्रत अवस्था में हमें ये मालूम नही होता की ये भी स्वप्न ही है। गुरु कृपा और विचार से हमारी बुद्धी शुद्ध हो जाती है और हमें यह मालूम हो जाता है की जाग्रत अवस्था जैसी कोई चीज़ नहीं होती और केवल हूँ होता है तब हम जीव मुक्त हो जाते है। विचार और विचरों का दृष्टा दोनों एक साथ ही आतें हैं और चले जाते हैं, जो कुछ बचता है वहीं हूँ है। इसी हूँ को स्वयं भी कहते है। दृश्य और दृष्टा दोनों ही स्वयं में आतें हैं और चले जाते हैं मग़र स्वयं हमेशा रहता है। मैं इसको “अभी” कहता हूँ। विचरों के नीचें जो मौन रूपी अभी (now) है इसपर ध्यान दीजिए। जीवन में इसके अतरिक्त और कुछ भी करना जरूरी नहीं है।

अजित वर्मा।

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