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दिल से पुकारों तो हर मुसीबतों पर भारी हूँ,
अपना समझ के बुलाओगे तो हर पल तुम्हारा हूँ,
मंदिरों में खोजोगे तो मैं मौन धारी हूँ,
धूप में ढूँढोगें तो परछांई तुम्हारी हूँ,
मैं बोलता नहीं हूँ कुछ मग़र सब पे भारी हूँ,
करता नहीं हूँ कुछ फ़िर भी चक्रधारि हूँ,
माया से ढक कर, संसार की हर लीला में मैं हूँ,
काली के नीचें शिवः भी तो मैं ही हूँ,
तेरे हर काम में प्रेरना मैं ही हूँ,
तुझमें बंधन मैं ही हूँ और तेरी मुक्ति भी मैं ही हूँ,
नास्तिकों का अविश्वास भी हूँ, और भक्तों का विश्वास मैं ही हूँ,
थक जाओगे जब मुझ्को ढूंढ़ते ढूंढ़ते,
विश्राम दूँगा मैं नींद बनके तुम्हारी,
हर सपने में मैं ही तो हूँ,
हर विचर का मौन दृष्टा मैं ही तो हूँ।
मैं को छोड़ दो बस, जो कुछ हूँ, तुम्हार ही तो हूँ।

लेखकः अजित वर्मा।

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