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सफ़र लम्बा है और बहुत दूर तक जाना है,
साथ होते हुए भी हमेशा अकेला है,
समझ में नहीं आता है किधर जाना है,
पता नहीं क्यों सब कुछ बेगाना है,
हर क़दम पर क्यों गिर जाता है,
लगता है इसे संभल के चलना नहीं आता है,
फिर भी क्यों ये अपनी ही कहें जाता है,
बार बार गलती किये जाता है,
मन तू बहूत सरफिरा है, जो ठान ले वो कर जाता है,
गिर कर भी तू संभलना नहीं चहता है,
लौटकर तू वहीं पर आ जाता है,
मन तू बहुत सरफिरा है,
एक बार शुरू हो जाए ये, तो इसको रुकना नहीं आता है।

लेखक, अजित वर्मा।

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