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मेरे पीछे मेरी ज़िन्दगी खड़ी थी,
मुड़कर देखा तो हँसने लगी थी,
ज़ुल्फो में उसकी कुछ यादें फसी थी
हाथ बड़ा के मुझको रोक रही थी,
पलकें उम्मीदों से खुली जा रही थी,
आँखे सपनों सी झिलमिला रही थी,

मुझको देख वो मुस्कुराने लगी,
हाथ पकड़ के अपना बनाने लगी,
अपनी आँखो में सपनें दिखाने लगी,
सासों में उतर के वो दिल धड़काने लगी,
नब्ज़ो में हलचल कुछ होने लगी,
बदन में बिजली सी बहने लगी,

होश में आके जो मैंने देखा
सिसकियों में ख़ुद को जागा देखा,
चूड़ियों में टूटी ज़मी वो पर पड़ी थी,
ज़िन्दगी जैसे दूर जा चुकी थी,
रोते रोते वो अधमरी सी होने लगी थी,
अपनी जिन्दगीं को यू सिसकते कभी नहीं देखा।

जाते जाते न मुझको दो ऐसी विदाई,
तुझको देखने के लिए कुछ सांसें लौट आई,
वक़्त बहुत कम है ऐसे तो न रो तुम,
बात को समझो, कभी दूर न थे हम,
शरीर की हदों में न ढूंढना हमको,
हर समय हम तुम्हारे ही रहेंगे,
मर के भी हम, तुम्हारे अंदर जिंदा रहेंगे।

लेखकः अजित कुमार वर्मा।
Written by Ajit Kumar Verma, 2 May 2016

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