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खोखली सी ज़िन्दगी में क्यों रहते हो हँस के,
लोगो से तो मिलते हो मगर द्वेष रख के,
खुद तो भटकें हो, क्यों औरों को उलझाते हो,
मीठी सी बातों में सबको फसाते हो,
वादों को हँस के धुँए में उड़ाते हो,
कही हुई बातों से अक़्सर पलट जाते हो।

मिलते हो जब भी याद दिलाते हो,
बचपन की बातों को अकसर दोहराते हो,
ख़ुद तो बदल गये हो मगर मुझको चिढ़ाते हो,
हम मज़ाक करें तो कियो भड़क जाते हो।

हदों में रहना औरों को सिखाते हो,
पर अपनी हदें खुद ही भूल जाते हो,
जनता हूँ आज ऊँचा है मुकाम तुम्हारा,
टूटी हवाई चप्पल में किसने बचपन गुज़ारा।

दोस्त एक समय वो भी था,
जब मुद्दतों बाद तुम आते थे,
सबसे तो मिलकर, पर हमसें बिना मिले ही चले जाते थे।

लेते नहीं थकते हो आज नाम जिनका,
दोस्तों में गिनते हो नाम उनका,
सुख में तो साथी बहुत मीलेंगे,
बुरा वक़्त आने पर यही लोग दूर खड़े दिखेंगे।

दोस्ती में कोई गिला शिक़वा नहीं रखना,
जबभी मिलना ये बात याद रखना,
वक़्त बदलता है तो दुश्मन भी दोस्त बन जाते,
मगर दोस्ती रहे न रहे,
सच्चे दोस्त कभी दुश्मनी नहीं निभाते।

लेखकः अजित कुमार वर्मा।
Written by Ajit Kumar Verma, 4th may 2016

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