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काश मैं उनकी सैंडल होता, ऊँची सी हील पर उनको ढोता।
उनकी ऐड़ी के नीच रहकर, हरदम उनका चुम्बन लेता। जब चलते वे मुझको पहनकर, सहारा देता उनको मैं जमकर, पैरो से उनके हरदम लिपटा रहता, टिक टिक कर उनकी बातें करता, काश मैं उनकी सैंडल होता।

शोभा बनकर उनके पैरो की, पार्टियों में चलू मैं टिक टिक कर। खोकर सहेलियों की बातों में, वो खूब झूलती मुझको पैरो पर। तारीफ करूँ मैं उनकी क्या? वे खूब नचाती मुझको स्टिलेटो पर। मुझको उतार कर वें खूब सुनातीं, अपनी खीज मुझपर बरसाती। डरते डरते बस मैं इतना ही कहता, की काश मैं उनकी सैंडल होता।

थक कर गुस्से में जब घर आकर, मुझको मेरी औकात दिखाकर, जब पटक देते हैं मुझको उतारकर। यूँही पड़ा रहता हूँ ज़मी पर, पीठ पर अभी भी उनके पाओं के निशां हैं, उनके पैरो के पसीने में भीगी, मुझमें अभी भी जान हैं। रोते रोते मैं फिर भी कहता, की काश मैं उनकी सैंडल होता।

उनके पैरो के नीचे आकर, अब चमक भी पड़ गई फीकी मेरी। पहन के मुझको खड़ंजे पर, चलते वो खूब ठुमक ठुमक कर। मैं तो हूँ उनकी सैंडल, फिर भी वे मुझको क्यों सताते? अपनी ऐड़ी से मुझको खूब दबाते। रोते रोते मैं यूँही नहीं कहता, की काश मैं उनकी सैंडल होता।

करते करते गुलामी उनकी, पीठ पर पड़े पाओं के निशान। जाते जाते इन सुन्दर पैरो ने मुझपर खूब किये एहसान, मैं थी उनकी प्रिये सैंडल, अब हो गई हूँ बेकार। कुछ महीनों का साथ था मेरा, उनके पैरो का ख़्वाब था मेरा। जाते जाते बस यूँही कहता, की काश मैं उनकी सैंडल होता।

विचार मंथन

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काश मैं उनकी सैंडल होता, ऊँची सी हील पर उनको ढोता।
उनकी ऐड़ी के नीच रहकर, हरदम उनका चुम्बन लेता। जब चलते वे मुझको पहनकर, सहारा देता उनको मैं जमकर, पैरो से उनके हरदम लिपटा रहता, टिक टिक कर उनकी बातें करता, काश मैं उनकी सैंडल होता।

शोभा बनकर उनके पैरो की, पार्टियों में चलू मैं टिक टिक कर। खोकर सहेलियों की बातों में, वो खूब झूलती मुझको पैरो पर। तारीफ करूँ मैं उनकी क्या? वे खूब नचाती मुझको स्टिलेटो पर। मुझको उतार कर वें खूब सुनातीं, अपनी खीज मुझपर बरसाती। डरते डरते बस मैं इतना ही कहता, की काश मैं उनकी सैंडल होता।

थक कर गुस्से में जब घर आकर, मुझको मेरी औकात दिखाकर, जब पटक देते हैं मुझको उतारकर। यूँही पड़ा रहता हूँ ज़मी पर, पीठ पर अभी भी उनके पाओं के निशां हैं, उनके पैरो के पसीने में भीगी, मुझमें अभी भी जान हैं। रोते रोते मैं…

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