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अध्यात्म क्या है?
पहचाने अपने सच्चे स्वरुप को।

अध्यात्म क्या है?

विविधताओं से भरे इस संसार में हमारा सामना अलग अलग व्यक्तियों और चीजों से होता है, परन्तु इन सब का अनुभव करने वाला मैं तो एक ही होता है, अर्थात जीवन के सारे अनुभव व्यक्तिगत ही होते है। जहाँ विज्ञानं हर वस्तु का अधयन अलग अलग करता है वहीं अध्यात्म उस साक्षी का अध्ययन करता है जिसके समक्ष सारे अनुभव प्रस्तुत होते है। जीवन की विविधताओं में न उलझते हुए सीधे साक्षी का अधयन करने को ही अध्यात्म कहते है।

इससे क्या लाभः होगा मुझको?

जीवन को हमेशा लाभ और हानि में परिभाषित करना हमारी नियती बन गई है। अध्यात्म लाभः और हानि के परे जाने का ज्ञान है।

इसके लिए क्या मुझको अपना सबकुछ (परिवार, सम्पति) छोड़ना होगा क्या?

ये कौन है जो पाता है और कौन है जो छोड़ेगा, इसका पता करो।

कौन और किसका पता करूँ? मैं तो अपने विषय में बात कर रहा हूँ।

तो अपने आप से पूंछो की “मैं” कौन हूँ?

मैं कौन हूँ? आप का मतलब मेरे नाम से है? मैं तो सुरेश हूँ।

सुरेश कौन है?

मैं सुरेश हूँ

अगर सुरेश मैं है तो फिर ये मैं कहाँ से आया है यह भी तो पता करो। बिना मैं के तो न सुरेश होगा न मुकेश। तुम कहते हो मैं सुखि हूँ, मैं दुःखी हूँ, सब कुछ इस मैं से ही तो निकल रहा है। सुरेश का स्रोत तो ये मैं है, पर इस मैं का स्रोत क्या है? अध्यात्म इन्ही प्रश्नों को उठाना है।

इन प्रश्नो के उत्तर से भला मेरा क्या लेना देना?

दृश्य का द्रष्टा से क्या लेना और देना? दोनों ही तो मिथ्या है।

मैं मतलब नहीं समझा?

समझने और ना समझने वाला ये मैं ही तो है, जो हमेशा दो अवस्थाओ के बीच द्वन्द में फँसा रहता है, सुख और दुःख, लाभः और हानि, जय और पराजय, ज्ञान और अज्ञान के बीच ये मैं ही तो है। इसका स्रोत पता करो और द्वन्दों से मुक्त हो कर जीवन के स्वामी बन जाओ।

गीता उपदेश में श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा था की हे पार्थ लाभः हानि, जय पराजय और सुख दुःख से ऊपर उठो पार्थ। हमारा जीवन तो सिर्फ द्वन्दों के बीच चुनाव करने में बीत जाता है, हम चुनाव जो भी करे पर द्वन्द से पार नहीं पा सकते और सुख दुःख के अंत हीन चक्र में फँसे रहना जैसे हमारी नियति बन गई है।

मैं फिर कहता हूँ, जीवन विकल्पों का चुनाव मात्र नहीं है, बल्कि विकल्पों के परे जाने का सुनहरा मौका है। अपने आप से प्रश्न करो की मैं कौन हूँ। यहीं प्रश्न तुम्हें द्वन्दों के परे ले जा सकता है। प्रश्न और उत्तर के बंधनों से परे सच्ची शान्ति ही तुम्हारा सच्चा स्वरुप है।

अजित कुमार वर्मा।

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