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इस कविता में लेखकः मैं रूपी अहंकार और उसका उपचार “आत्म विचार” के बीच होते संवाद को दर्शाती यह कुछ पंक्तिया आप के सामने प्रस्तुत करने की चेष्टा की है। दैनिक जीवन में हमारे मन में उठते सवाल और उनके जवाब ढूंढ़ता इंसान अक़्सर इन सवालों से दो चार होता रहता है। मन में उठते विकारों को बड़ी विनम्रता से इन कुछ पंक्तियों में प्रस्तुत करता हूँ।

अजित कुमार वर्मा।

“मैं” पूँछे सवाल?

इस जीवन को छोड़ कर मैं कहाँ चला जाऊ,
सुकून पाने की तलाश में भटकता चला जाऊ,
वासनाओं में भीग कर भी प्यासा रह जाऊ,
रंगो के बीच हो कर मैं तो सादा ही रह जाऊ,
उफ़ इस जीवन से भागकर मैं कहां सुख पाऊँ,
कोई तो बता दो मैं जाऊ तो कहाँ जाऊ।

उत्तर देता आत्म विचार

मैं, तू तो अहंकार है,
तेरे होने से तकरार है,
ये जान ले की तेरा प्रश्न ही आत्म विचार है,
यही तेरी मुक्ति का द्वार है,
हे अहंकार तेरे प्रश्न को नमस्कार है।

प्यास से तू विचिलत है,
भोग से भी विक्षिप्त है,
हे अहंकार तेरे मैं से ही तेरी हार है,
इस मैं को पहचान कर,
तू कर ले आत्म विचार।

स्रोत ख़ोज इस मैं तृष्णा का,
आत्म बल है ये सब इक्छाओ का,
बीज है तेरे हर सुख दुःख का,
जो कुछ आता सब मैं से आता,
जो कुछ जाता इस मैं से जाता,
कोई न जाने मैं कहाँ से आता,
नींद में जाने कहाँ छिप जाता,
स्रोत ख़ोज इस मैं तृष्णा का,
आत्म बल है ये तेरी इक्छा का।

लेखकः अजित कुमार वर्मा।

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