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हमारा मन जो पथिक की भाँति व्यथित हो कर इक्छा पूर्ति के अंत हीन मार्ग पर चलता रहता है, उस मन की दशा और दिशा को दर्शाती ये कुछ पंक्तिया कवी आपके समक्ष प्रस्तुत करता है। धन्यवाद ।।

अजित कुमार वर्मा।

व्यथित पथिक मन

व्यथित पथिक मन, कथित व्यथित तन,
उलझ उलझ मन, जलत जलत तन,

बुझत बुझत उमंग, ललित ललित, अहम्,
उड़त उड़त, मन, बहुत, बहुत है कम,

घटत घटत, उठे, रुकत रुकत, बड़े,
कहत कहत, न सुने, लगत लगत, न लगे,

सोवत सोवत जगे, स्वपन स्वपन चले,
रुकत रुकत न रुके, मनन मनन चले,

बैरी मुझसे न सधे, व्यथित पथिक मन।

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