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यह तो आप मानेंगे ही की हर इंसान दुनिया को अलग अलग नज़रिये से देखता है, दुनिया के प्रति हमारी समझ पर हमारी परवरिश और माहौल का भी असर होता होगा। जीवन की हर एक घटना से सीखें गए सबक दुनिया के प्रति हमारे नज़रिये पर अपना प्रभाव ज़रूर डालते होंगे। ऎसे में एक व्यक्ति या एक विषिश्ट समाज की दुनया के प्रति एक विषिश्ट सोंच तो होती ही होगी। कहने का अर्थ यह है की व्यक्ति की निज़ी सोंच और समझ अक़्सर दर्पण होती है उसके परिवारिक और समाजिक मूल्यों का। इस तरह हर एक व्यक्ति और उससे बना समाज दुनिया को परिभाषित और समझने की कोशिश करता है। ऐसे में यह तो साफ़ हो जाता है की दुनिया जैसी वास्तव में है वैसी हमको नहीं दिखती, हम तो दुनिया को अपने चश्मे से देखते आए है, इस बीच प्रश्न यह उठता है की दुनिया की जो वास्तिविक तस्वीर है उसे हमारा समाज कितनी हद तक स्वीकार कर सकता है या नहीं। जीवन की कुछ ऐसी ही वस्तिविताओ को “सत्य” कह कर ऋषि मुनियों और ज्ञानी महापुरुषों ने परिभाषित करने का प्रयास किया है। जीवन की वास्तविक तस्वीर या सत्य अक़्सर समाज को पसंद नहीं आते और वो उनसे मू चुराते हुए दिखता है। ऎसे में इस लेख़ में मैं समाज में सत्य के स्थान और उसकी लोप्रियता को भाँपने का प्रयास करूँगा, उम्मीद है की मेरे बहाने आप को भी अपने कुछ प्रश्न के उत्तर इस लेख में मिल जाए, यदि ऐसा नहीं होता है तब भी निराश ना होइएगा, लेख़ से कुछ ज्ञान वर्धन तो अवश्य होगा।

जीवन की वस्तिविताओ से हमारा सामना तो जन्म लेते ही शुरू हो जाता है, जैसे की भूख़, प्यास और असुरक्षित होने का आभास तो नये जन्मे शिशु को भी होता है, इसीलिए वो अपनी माता से चिपक कर सुरक्षित महसूस करता है, और रो रो कर अपनी भूख़ प्यास का इज़हार भी कर देते है। सामाजिक ताने बाने में बड़ा होता हुआ शिशु परिवार की आदतों को सीखना शुरू कर देता है, सामाजिक ताने बाने में बढ़ते हुए हम जीवन की वस्तिविताओ से अनिभज्ञ होना भी सीख जाते है। दुनिया क्या है वो हमें ए, बी, सी, डी की तरह रटा दी जाती है। पर वस्तिविताओ के प्रति हमारा डर कभी हमारा साथ नहीं छोड़ता और हमे बचपन से ही वस्तिविताओ से दूर एक उज्जवल भविष्य के सपने देखना सिखाया जाता है। जैसे गौतम बुद्ध को बचपन से ही उनके पिता ने जीवन की कठोर वस्तिविक्ताओ से दूर रखने की असफल कोशिश की थी। कुछ इसी प्रकार हमे भी माता पिता जीवन की वस्तिविक्ताओ से दूर रखने का प्रयास यह सोंच कर करते हैं की ये सब बातें तो बुड़ापे के लिए छोड़ देनी चाहिए, तो क्या इसका अर्थ यह है की सत्य से जूझना केवल वृद्ध मनुष्यों का काम है?

चिप्स चॉकलेट और कार्टून किरदारों से घिरा हमारा बचपन, जीवन की कठोर वास्तविकताओं से परे दुनिया की एक परी लोक जैसी छवि पेश करता है। सच्चाई से परे इस दुनिया में सब कुछ अच्छा ही अच्छा दिखता है, ऎसे माहौल में पले बड़े बच्चे विविध प्रकार की विरोधाभासी इक्छाओ से ग्रस्त हो जीवन में संघर्ष करते दिखते है। युवाओं में बढ़ता असंतोष और आत्महत्या जैसे रास्तों का चूनाव यह दिखाता है की वस्तिविक्ताओ से कट कर हमारा जीवन एक अंत हीन संघर्ष बन जाता है, ऎसे में जीवन के कठोर सबक जितनी जल्दी सीख ले उतना ही अच्छा होगा। हम ना कुछ ले के आये थे और ना कुछ ले के जाएंगे, मृत्यु जीवन का अटल सत्य है और अमीर हो या ग़रीब सबकी मृत्यु एक दिन होगी। मृत्यु के बाद आपको कोई याद नहीं रखेगा। इन सब बातों को ध्यान में रखकर अगर हम अपनी इक्छाओ का मूल्यांकन करे तो हम पाएंगे की हम कितनी फ़िज़ूल की चीजों के लिए व्यर्थ ही परेशान हो रहे थे। जीवन अच्छे बुरे का संगर्ष नहीं है बल्कि अच्छे बुरे से ऊपर उठकर शान्ति पाने का सुनहरा मौका है। जीवन की वस्तिविक्ताओ से परे जो कुछ भी हम पाने की इक्छा रखते है वो हमें व्यर्थ के संगर्ष में उलझा देती है और हम शान्ति खो देतें है। शान्ति ही परम सत्य है इसके अलावा जो कुछ भी है वो व्यर्थ ही है। तो सत्य क्या शान्ति है?

श्री कृष्ण ने कहा था की शान्ति जिस मोल मिले सस्ती है, इसीलिए उन्होंने जरासँग से युद्ध में न उलझते हुए, मथुरा छोड़ के द्वारिका चले गए। जीवन में हम अक़्सर सिर्फ अपने अहंकार वश व्यर्थ के संगर्ष में फंस जाते है। हम अपने को ताकतवर और सम्पन मानकर हर चुनौती को अपनी इज़्ज़त का सवाल बनाकर व्यर्थ के संगर्ष में कूद जाते हैं,यह हमारी बुद्धिमता है या बेवकूफ़ी ये आप ख़ुद ही तय करें? वेद हो या गीता “सत्य ही शान्ति है” यही संदेश सब ग्रंथो में है। ॐ में जाग्रत अवस्था वैश्वनारा, स्वप्न अवस्था तेजस और नींद प्रज्ना तीनो के लिए शान्ति शान्ति और शान्ति को ही तुरीय कहाँ गया है। निःसन्देह शान्ति ही भारतीय अध्यात्म का परम सन्देश और सत्य है।

अगर शान्ति हमारी भारत भूमि का परम सन्देश है तो यह आज लोगों की प्राथिमिकता में क्यों नहीं दीखता? शान्ति तो हमारा मूल स्वरुप है परंतु हम शान्ति की ख़ोज द्वन्द में करते है। यह द्वन्द क्या है? दुनिया में जो कुछ भी है वो द्वन्द ही तो है। सुख और दुःख, अमीर और ग़रीब, रात और दिन, स्त्री और पुरुष, इत्यादि सब द्वन्द ही तो हैं। यह दुनिया द्वन्द रुपी माया है, सुख की कामना दुःख के बिना नहीं होगी, इसलिए हम कुछ भी कामना करें उसका, फल स्वरूप हमें द्वन्द ही मिलेंगे। द्वन्द का कोई अंत नहीं होता, अच्छे की कामना उसके विपरीत को भी आकर्षित करती है। इसलिए कामनाओं से मुक्ति ही शान्ति या मौन है। नींद में हम कामनाओं से मुक्त होते है तो हम शान्त होते है। द्वन्द से परे जो कुछ भी है वो हमारा मूल स्वरूप शान्ति है। इसलिए शान्ति ही परम सत्य है।

मनुष्य शान्ति पाने के लिए क्या क्या नहीं करता पर वो यह भूल जाता है की द्वन्द में रहकर वो कभी शान्त नहीं हो सकता। लाभ हानि के फेर में भला शान्ति कहाँ। द्वन्द (सुख दुःख) में रहकर शान्ति की खोज हमें पुनः द्वन्द (सुख दुःख) प्राप्ति कराएगी, इस चक्र का कोई अंत नही होता। शान्ति को सुख में खोजने की हमारी प्रवर्ति ही माया या अज्ञानता कहलाती है। शान्ति सुख में नहीं है, शान्ति तो हमारा मूल स्वरूप है, सुख दुःख की कामना छोड़ दो तो शान्ति ही शान्ति है, कोई और ख़ोज की ज़रुरत नहीं होती। यही परम् सत्य है और सत्य समय और लोकप्रियता का महोताज़ नहीं होता, वो तो अटल और सहज होता है, केवल मनुष्य उसे खोजने की गलती बार बार करता रहता है और द्वन्द रूपी माया जाल में फंसा रहता है।

लेखकः अजित कुमार वर्मा।

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