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द्वन्द में जीवन

मनुष्य को हमेशा यह लगता है की वो अपने परिश्रम से दुनिया में बदलाव ला सकता है और उसका अहंकार उसे निरंतर कुछ न कुछ करते रहने को विवश करता रहता है। परंतु दुनिया तो द्वन्द के नियम से बंधी है रात का दिन है, काले का सफ़ेद है और सुख का दुःख। भौतिक नियम भी यही बताते है की लगाए गय बल के बराबर विपरीत बल भी पैदा होता है, इस तरह हमारे द्वारा किया गया काम का विपरीत भी अवश्य पैदा होता है। अगर हम सुख की कामना करेंगे तो दुःख भी साथ आएगा, इस तरह द्वन्द में कुछ भी चाहों उसका विपरीत भी हमें भोगना पड़ता है, यह सृष्टि का अटल नियम है। अच्छे की चाहत हमें बुरा भी देगी यह बात याद रखनी चाहिए। इसी नियम से प्रेरना पाकर यह कुछ पंक्तिया प्रस्तुत करता हूँ।

अजित कुमार वर्मा।

द्वन्द में रहकर तुमको है जीना,
ऋतुओं की भाँति सुख दुःख है सहना।

चाहें हो जो भी, कुछ करते रहना,
हरदम विकल्पों में उलझे रहना,
न जाने कितनी बार चुनो तुम,
हर रस्ता तुमको वहीं लौटाता,
गोल गोल घूमे रे पहिया,
दुनिया है द्वन्दों की भूलभुलिया।

द्वन्द में रहकर तुमको है जीना,
ऋतुओं की भाँति सुख दुःख है सहना।

ना कोई आता ना कोई जाता,
इन फेरों में बस उलझे रहना,
है जीवन द्वन्दों का घेरा,
करते करते बस इन्ही में रहना,
ऋतुओं की भाँति सब आता जाता,
ज़ोर किसी का, नहीं चलने पता।

द्वन्द में रहकर तुमको है जीना,
ऋतुओं की भाँति सुख दुःख है सहना।

करते करते जब तू थक जाता,
इन फेरों से तुझे कौन बचाता,
गहरी नींद तू जब सो जाता,
द्वन्दों से जैसे मुक्त हो जाता,
समय अंतराल तब सब घुल जाता,
शिव के आगे सब रुक जाता।

द्वन्द में रहकर तुमको है जीना,
ऋतुओं की भाँति सुख दुःख है सहना।

जाते जाते मैं बतलाता,
हर इक्छा में तू सुख ही चाहता,
रहते रहते भूल कियों जाता,
दुःख के बिना, क्या सुख होता?
दुनिया तो है द्वन्दों का फेरा,
ऋतुओं की भाँति सुख दुःख है सहना।

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