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रुकते रुकते रुक जाते है, चलते चलते जब थक जाते है,
जीवन में आती लाखों मुश्किल, हर ठोकर लगती पहले से मुश्किल,
लड़ते लड़ते हम रह जाते है, खट्टे मीठे में क्यों फँस जाते है,
है अनुभव हमको बहुत मग़र, सस्ते महंगे में ठग जाते है,

होता है अपनों पर गर्व मग़र, रिश्ते नातो से क्यों लगता डर,
कहने को तो है दोस्त मग़र, विशवास नहीं तो डर ही डर,
जब तन पर जवानी रहती है, तब दिल में रवानी रहती है,
हर मौका सुहाना लगता है, रूपये के आगे भी कुछ दिखता है,
रुपिये पैसे के जमघट में, हर रिश्ता अपना लगता है,

किस्मत तो गाड़ी का पहिया है, चलते चलते जब रुक जाता है,
अक़्सर जवानी के मेलों में, यह खेल समझ नहीं आता है,
ढूंढे नहीं मिलते यार मेरे, अबतक दिखतें थे साथ खड़े,
अपने अपनों के दंगल में, हर इंसान खड़ा अकेला है।

इंसान की न होती बात कोई, जब पैसों में नपती है औक़ात तेरी,
सच्चे झूंठे का भेद नहीं, जब हेर हो सब पैसों का,
रुपिये पैसों में अंधी है, दुनिया पैसों की मंडी है,
रिश्ते नातो में तंगी है, सब दूर रहें जहाँ मन्दी है।

लेखकः अजित कुमार वर्मा।

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