निरंतरता के मौन आकाश में,

मैं कौन हूँ जो विचारों में, 

“मैं” लगाता चला जाता हूँ, 

सुख और दुःख में “मैं” “हूँ”,

को खोता चला जाता हूँ,

अनुभवों के दंगल में,

भावनाओं की भेंट क्यों चढ़ा देता हूँ,

इस “मैं” में “हूँ” को क्यों भुला जाता हूँ।
निरंतरता का आकाश छोड़ कर,

विचरों में क्यों चला जाता हूँ? 

मैं कौन “हूँ” इस प्रश्न में क्यों उलझ जाता हूँ,

सबकुछ पाकर भी अधूरा क्यों रह जाता हूँ, 

निरंतरता के मौन आकाश में “मैं” कौन हूँ,

जो विचारों में “मैं” लगाता चला जाता हूँ।

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लेखकः

अजित कुमार वर्मा।
व्याख्या: 

यहाँ यह बता दू की “मैं” अहंकार (ego) का सूचक है, और निरंतर रहने वाली चेतना या आत्मा को हूँ से अलंकृत किया गया है। उदाहरण के तौर पर अगर मैं यह कहूँ की ” मैं अजित हूँ” तो सिर्फ हूँ को हटा देने से मैं का महत्त्व समाप्त हो जाता है। तो हूँ निरंतरता को दर्शाती है, मौन भी तो निरंतर रहता है, विचार निरन्तर रहने वाले मौन पृष्टभूमि पर ही तो आते और जाते है, पर मौन हमेशा बरक़रार रहता है। इस कविता को बिना हूँ के पढे तो हूँ का महत्व समझ में आ जाएगा।
धन्यवाद! 

अजित कुमार वर्मा।

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