श्री कृष्ण भक्ति में यह मेरा प्रथम भजन अर्पित करता हूँ।

जय श्री कृष्ण।
भक्ति है निज स्वार्थ आहूति, 

भक्त ह्रदय में हरि प्रेम उमड़ता,


जो बाँसुरी बन के ह्रदय में राजे,

वो हरी मोरा कृष्ण कहलाता, 
मोरे ह्रदय की चोरी करै जो,

मोरे ह्रदय की चोरी करै जो,


वो हरि मोरा नटवर कहलाता।
भक्ति है निज स्वार्थ आहूति, 

भक्त ह्रदय में हरि प्रेम उमड़ता,
जो बाँसुरी बन के ह्रदय में राजे,

वो हरी मेरा कृष्ण कहलाता, 
निस दिन देखें स्वपन ये आँखे,

हरि के चरणों में हो शीश हमारा,
जो होवै स्वाभिमान भक्तन का,

सुदर्शन धारे, गिरिधर मोरा,
जो बाँसुरी बन के ह्रदय में राजे,

वो हरी मोरा कृष्ण कहलाता, 
भक्ति है निज स्वार्थ आहूति, 

भक्त ह्रदय में हरि प्रेम उमड़ता।
लेखक

अजित कुमार वर्मा।

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