रिश्तेदारों की तो न पूँछिये, तो अच्छा,जब कोशिश की हमने निभाने की,तो बात बिगड़ गई, कही उनकी, तो कही हमारी, गलती निकल गई,इस देने और लेने के चक्कर में,रिश्तेदारी पीछें छूट गई,हद तो तब हो गई यारों,किस्सा न वो ख़त्म कर सके न हम,यह कहानी अधूरी ही रह गई।


रिश्तेदारी में हम अक्सर न तो निभा पते है और न तो रिश्तों को तोड़ पाते है, हमारी इसी मज़बूरी पर मेरा यह व्यंग आप को अच्छा लगा हो तो लाइक करें।

धन्यवाद।

लेखकः

अजित कुमार वर्मा।

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