न जानू का भाषा होवे, न जानू का शैली,
मै मूरख क्या लिखना जानू, का जानूँ मै पढ़ना,

हाथ पकड़ सब हरि लिखवाएं,नाम लगये सो मोरा,

हरी चरणों से प्रीत है मोरी,जो होवै सब हरि लीला।
कृष्ण कृपा से 

लेखकः

अजित कुमार वर्मा।
लोग मुझसे पूंछते है कि मैं यह सब कहा से लिखता हूँ, आपके इस प्रशन का उत्तर देती यह कुछ पंक्तिया प्रस्तुत है।

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