जीवन है शमशान समझले,
कटु वचन यह पूछ?
दुनिया के इस दंगल में,
क्या लेके आया तू कुछ?

दौड़ दौड़ फिर थकता तू क्यों?
जब छोड़ के जाना सबकुछ,
अपने अपने के चक्कर में,
क्यों हड़प गया तू सबकुछ।

है चिताओं के बीच खड़ा तू,
फिरभी न समझा तू कुछ,
रुपिये पैसे की माया में ,
जब भूल गया तू सबकुछ।

तिनका तिनका जोड़ जोड़,
क्या खूब बनाया सब कुछ,
माया के ओझल पिंजड़े में,
रह रह कर हारेगा सबकुछ।

है जाना सब एक दिन,
संग रहना न कुछ,
बंद मुट्ठी खुल जानी है एकदिन,
शमशान में जल जाना सबकुछ।
लेखकः अजित कुमार वर्मा।।

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