अमरत्व देती है मुझे,

अपना एहसास देती है,

बस एक कश में सारी,

जनन्त घुमाती है,
ऐसा है नशा उसका,

होंठो से छूकर जो मुझे,

अपना बनाती है, 

हर साँस में रहकर वो मेरी, 

फिर क्यों चिढ़ाती है।
खामोशी से सुलगती हुई,

वो मोहब्बत में जलाती है,

आशिक नहीं हू मैं उसका,

फिर क्यों लुभाती है।
मैं न चाहते हुए,

उसे मुँह लगाता हूँ,

क़यामत को अपनी उंगलियों में,

क्यों सजाता हूँ,
है बात उसमे कुछ ऐसी,

मैं समझ नहीं पाता हूँ,

जब लबों से लगाकर मै उसको,

धुंए में उड़ता हूँ,

 

है जान की दुश्मन मेरी वो,

यह बात मानता हूँ,

मुझे माफ़ करना यारों,

क़ातिल हसीना की अदा से

मात खाए जाता हूँ।
लेखक अजित कुमार वर्मा।

Advertisements