जीवन ने मुश्किल सबक सिखाया,

फिर भी हमको समझ न आया,

है मूर्ख सदा वोही कहलाया,

गलती कर, गलती को दोहराया,
सुख दुख मे आगे बढ़कर जिसने,

रिश्ते नातो का फ़र्ज़ निभाया,

सीड़ी बनकर अपनों की जिसने,

हर इक्छा को परवान चढ़ाया,

सुख दुःख अपना भुलाकर जिसने,

मुश्किल वक़्त में साथ निभाया,
है मूर्ख सदा वोही कहलाया,

गलती कर गलती को दोहराया,
समय बदलते देर न लगती,

किस्मत भी कबतक रूठी रहती,

दिन फिर गए उनके, छटी उदासी,

मुरझाए पत्तों में, जान सी भर गई,
समय बदला, रंगत बदली,

एक पल ने सारी बाज़ी पलट दी,

हैरत तो हुई तब मुझको,

जब उन्होंने  अपनों की,

परिभाषा ही बदल दी,
हो गए अपने ,कल थे जो पराए,

आगे क्या कहूँ हाय रे हाय,

हम तो अपनों में हुए पराए,

करके सेवा गैर कहलाए,
रिश्तों की परिभाषा रोज बदलती,

काम निकल जाए,

तो काहे की यारी,

हर मुर्ख की बस एक उपाधी

बाहरी बाहरी सिर्फ बाहरी।
लेखक अजित कुमार वर्मा।

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