सपनों की रंगत में भटकी,

दुनिया अंधो की नगरी,

जहाँ चश्मों में छुपती है,

हवस नज़रो की, 

भूखी रहती हो जहाँ,

हर जीभ लालच की,

कमी नहीं कपड़ो की,

पर इज्जत है नंगी,
हो मुज़रिम की इज़्ज़त,

और गरीबी गुनहगारी

मेहनत की दलाली है,

और मक्कारों की दिवाली,

दुनिया है गज़ब,

अजब खेलों की प्यासी,

चौके छक्के करोड़ो के,

शाहादत मोहताज पाई पाई की,
औक़ात करोड़ो की मगर,

नियत चरित्र पर भारी,

दुनिया तस्वीरों में प्यारी,

पर हक़ीक़त में है लाचारी,

मिलते हो उत्तर किताबों में सारे,

फिर जीवन से लोग क्यों हारे?

नशें में धुत है युवा पीढ़ी,

हक़ीक़त से रूबरू होने की,

हिम्मत किसमे।
हो नियत में खोंट,

तो यह सवाल बेमानी,

चलता हो काम जब रिश्वत से,

ईमादारी सिर्फ किताबी,

नपती हो इज़्ज़त जहाँ पैसों से,

पड़ती नहीं ज़रूरत कपड़ो की उसे,

नंगो में अंधे हो या अंधो में नंगे,

फर्क नहीं पड़ता,

अपने स्वार्थ के आगे,

कोई जिये या मरे,

फ़र्क नहीं पड़ता।
मुझे परेशानी नहीं है किसी से कोई, यह तो कवि की मज़बूरी है, सामाजिक मुद्दों पे लिखने की,

देश में आज़ादी है।
लेखकः अजित कुमार वर्मा।

Advertisements