नदिया रानी बहती जाती,

बूढ़े पेड़ की कथा सुनाती,

नदी किनारे खड़ा पुराना,

कई बाढो से लड़ा मरदाना,

बूढ़ा पेड़ हो चला पुराना,
एक गिलहरी थी अकेली,

बूढ़े पेड़ की प्रिय सहेली,

घने छांव में बचपन खेला,

फलों सा मीठा जीवन बीता,
बूढ़े पेड़ का अंतिम समय जब आया,

उसने गिलहरी को यह कह समझया,

सुन गिलहरी मेरी प्रिय सहेली,

तूने मुझपे अपना घर बसाया,

मेरे फलों से भोजन पाया,
मैं हूँ बूढ़ा पेड़ पुराना,

मेरी शाखों को दीमक ने खाया,

जीवन का न कोई सहारा, 

सुन गिलहरी सलाह ये मेरी,

अबकी नादिया में बाढ़ जो आई,

मेरे संग तेरी जान भी जाई,
सुन गिलहरी को रोना आया,

बूढ़े पेड़ को पिता सा पाया,

छाँव में जिसकी सदा सुख पाया,

अंत समय  न  छोड़ा जाया,

बाढ़ का पानी ज्यो चढ़ आया,

बूढ़े पेड़ ने जीवन गवाया,
मर के पेड़ ने फ़र्ज़ निभाया, 

शाखों पे गिलहरी को तैराया,

जीवन पेड़ का धन्य कहलाया,

मर के भी उसने प्रेम सिखाया,

मृत्यु में जिसने जीवन बचाया।
माता पिता का जीवन भी पेड़ के समान होता है, वो जीवन भर अपने बच्चो को स्नहे और पोषण देते है। जीवन में माता पिता की सेवा से उत्तम और कोई धर्म नहीं है।
लेखक अजित कुमार वर्मा।

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